मैं व्यवस्था हूँ


मैं व्यवस्था हूँ
निर्जीव होकर सबसे सजीव सा रु-ब-रु होता हूँ
रोज़ सुबह से शाम तक कोसा जाता हूँ
धकियाया जाता हूँ फिर पास बिठा के सहलाया भी जाता हूँ

मैं व्यवस्था हूँ 
अपने सूरज का कुछ पता नहीं है 
अँधेरे से कोई गिला नहीं है 
लेकिन अपनों से प्यार-फटकार पाता हूँ 

मैं व्यवस्था हूँ
सीना तान के चलता हूँ
बौराए हांथी के मानिंद दौड़ता हूँ
जेब में जब तक पैसे की भरमार है
इज्जत,सोहरत से लबरेज,मालामाल हूँ


मैं व्यवस्था हूँ 
करोड़ों के आँखों की उम्मीद हूँ 
सबके सपनों की उड़ान हूँ 
भागती-दौड़ती जीवन की पहचान हूँ 
अपने हाँथों में जब तक कमान हैं...!!!

डॉ.सुनीता

6 comments:

  1. मैं व्यवस्था हूँ
    सीना तान के चलता हूँ
    बौराए हांथी के मानिंद दौड़ता हूँ
    जेब में जब तक पैसे की भरमार है
    इज्जत,सोहरत से लबरेज,मालामाल हूँ

    सटीक पंक्तियाँ


    सादर

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  2. बढ़िया.
    एक सकारात्मक विचार.

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  3. मैं व्यवस्था हूँ
    करोड़ों के आँखों की उम्मीद हूँ
    सबके सपनों की उड़ान हूँ
    भागती-दौड़ती जीवन की पहचान हूँ
    अपने हाँथों में जब तक कमान हैं...

    बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति,बेहतरीन सार्थक रचना,......

    MY RESENT POST... फुहार....: रिश्वत लिए वगैर....

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  4. बहुत ही सुन्दर विचार शब्दों के माध्यम से दिया है आपने

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  5. बहुत सटीक लिखा गया है बहुत अच्छा लिखा है आप ने इस लेख के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् आप को

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