'फेसबुक बनाम चेहरे के किताब का नंगापन'


जिस तेज़ी से पूरी दुनियां में संचार का आगमन हुआ है उसी के अनुपात में करप्सन भी फैला है.हम सब इस बात से कत्तई इनकार नहीं कर सकते हैं.क्योकि लोकप्रियता के लालसा में लोगों ने अजीबो-गरीब मुद्दों,बाहियात हरकतें और घटिया स्तर के चीजों को हथियार बना के पेश किया,जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है.अब देखिये न एक तरफ सरकार इसके आज़ादी को लेकर भयभीत है.दूसरी तरफ इन दिनों फेसबुक में चोरी और बत्तमीजी का मामला जोरों पर है.सच तो यह है किसी चीज़ की अति नुकसान भी उसी अनुपात में पहूँचाती है.यह क्षति न केवल राष्ट्रीय, मानवीय, नैतिकता, परम्परा, परिवेश, परवरिश और प्रतिभा पर है,बल्कि अपनी संस्कृति,संस्कार और सभ्यता का दोहन भी कह सकते हैं.यह सब एक दिन,अचानक से या फिर तात्कालिक नहीं है वरन इसके परिणाम दूरगामी हैं.
हम जिस गरिमामय समाज के वाशिन्दें है वहाँ के अनुकूल का रहन-सहन बहुत मायने रखता है.बलिहारी हो मौसम का बल्कि बधाई देनी चाहिए.जो माता-पिता अपने संतान के पहनावे से तंग थे उन्हें बड़ी राहत मिली होगी.फैशन,आज़ादी और शोषण के नाम पर नंगा-पूंगा घूमने वाले बेहद नाराज होंगे.लेकिन यह खफगी कुछ दिनों की मेहमान है.जैसे ही दिन बदला-दौर बदला रंग-ढंग ने भी चोला बदला.
अभी जो लोग इन अत्याधुनिक संसाधनों के पुजारी हैं.दूसरी तरफ जो आलोचक हैं वही एक दिन बहुत बड़े प्रसंसक भी होंगें.ऐसा प्रतीत होता है.यह बात पूरी तरह से स्पष्ट है.क्योंकि आने वाले हर दौर को लोग बेहतर ही बताते हैं.जैसे हमारे दादा-दादी के ज़माने अपने-आप में निराले थे.जिसकी बढ़ाई वे लोग बड़े मन और चाव से करते हैं.पिता जी लोग अपने समय को अच्छा बताते हैं.एक दिन ऐसा आयेगा जब हम सब अपने हिस्से के कसीदें पढने से पीछे नहीं हटेंगे.वैसे ही यह नौनिहाल भी अपने छाया को प्रतिछाया ही बताएँगे.
पूरी की पूरी एक पीढ़ी ही स्वतंत्रता के नाम पर विकृत रूप लेती स्वछंदता के कायल हैं.यह संकेत किसी भी तरह से ठीक नहीं कही जा सकती है.दोस्ती के नाम पर फूहड़ मजाक शगल बनता जा रहा है.क्रूरता के हद तक पहुच चुकी मानसिक विकृति बेहद शर्मनाक है.जातिवादिता के नाम पर इंसाफ की दुहाई देने वाले लोग कब भद्दगी पर उतर आते हैं.इसका उन्हें भान भी नहीं हो पाता है.ऐसे ही फटटामार लहजे की शिकार युवा भी हैं.जो अपने को यहाँ के हम सिकंदर हैं की लकवा से ग्रसित हैं.
जब किसी को अपने मन-मुताबिक बादशाहत नहीं मिल पाती तो निम्न स्तर के छिछोरपन पर उतर आते हैं.इन दिनों लोगों में फैली लोकप्रिय फेसबुकिया पापुलेरिटी को एक खतरनाक विमारी कह सकते हैं.इसे गैंग्रीन का बदला रूप कहें तो अनुचित न होगा हैं.जो शरीर,दिल-दिमांग और सोच पर कुंडली मारे बैठी है.इसी प्रसिद्धि के खुराफाती मावज ने चौतरफ़ा गंध फैला दी है.जिसके ज़द में साधारण,सीधा-सच्चा और बेकसूर की जान सांसत में है.कमाल इस बात का है कि सब कुछ जानने के उपरांत भी किसी के कार्य में बालभर भी फर्क नहीं आया है.
थोड़ा आगे बढ़कर गौर करें तो एहसास होता है कि इन नए-नए माध्यमों ने आम इंसान के अंदर उमड़-घुमड़ रहे विचारों को दिशा दी है.नये पल्लवों को पुष्पित होने का मंच मिला है.पंखुड़ियों से निकलकर खुसबू ने बिखरना सीखा है.घोसलों से बाहर की दुनिया के हकीक़त को पहचानने का मार्ग दिया है.अबोध रचनाओं को नकारे जाने के जिल्लत से मुक्ति मिली है.हा...!कुछ मनचलों के फुहड़पना को भी पनाह मिल गया है.कुल मिलाकर देखा जाये तो पांचों अंगुली बराबर नहीं होती है.सकरात्मक और नकारात्मक पहलू से वास्तविक परख होती है. किसके मन में क्या है वो ऐसे ही कुछ जगहों पर उजागर होती हैं.मेरे ख्याल से पत्रकारिता के बदलते स्वरूप के रूप में देखना/आकलन करना गलत न होगा.. 


वस्तुत: इन सुबिधाओं के साथ लोगों ने अपने उललू भी सीधा किया है.एक दूसरे के रचनाओं को अपना बनाकर पेश करने की अदा से ग्रस्त हैं.सब कुछ चुराया जा सकता है.वो भी सीनाजोरी के साथ पहचान,नाम,शोहरत,सीरत,सूरत और सच्चाई को भी कैद कर एक नई शक्ल में बड़ी आसानी से ढाली जा सकती है.इसी का नतीजा है कि इन दिनों लोगों में दहशत सी है.इससे बचने का एक ही रास्ता है कि संभल-संभल के कदम उठाया जाये,फिर उमंग-तरंग के साथ आगे बढ़ने में कोई बुराई नहीं है.
सावधान..!सुरसा ने अपना जबड़ा जी भर फैलाया है.बचो-बचो वरना कुछ भी बचनेवाला नहीं है...!



                                             डॉ सुनीता 

                                                 

21 comments:

  1. बिलकुल सटीक और सामयिक आलेख है।
    आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ।

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  2. सार्थक प्रस्तुति...............

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  3. जैसे 'चाकू'रसोई मे भोजन सामग्री के काम आता है और आपरेशन थियेटर मे 'डॉ'के काम आता है तब उपयोगी है किन्तु 'डाकू' के हाथ मे जाकर वही गलत हो जाता है ठीक उसी प्रकार संचार माध्यम-'फेसबुक' आदि उनका प्रयोग करने वाले के अनुसार अच्छे या बुरे हो जाते हैं। जिसके जैसे संस्कार होंगे वैसी ही उसकी मानसिकता होगी। अश्लीलता का निषेध तो होना ही चाहिए।

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  4. Sakaratmak aur Nakaratmak dono pahlu dekhne chahiye.......Mere vichar se aapne sikke ka ke hi pahloo dekha........


    manoj

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  5. har achchhi baat me kuchh galat baaten chhipi hoti hai:)

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  6. vigyaan: vardaan aur abhishaap"
    aise nibandh schools mei isiliye padhaye jate the...

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  7. पूरा आलेख दो दफे पढ़ा , वाकई यह स्थिति दुखद है , बहुत ही समयानुकूल लिखा है आपने /आवश्यकता है इसे चेतावनी bhare लेखों की

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  8. संभल-संभल के कदम उठाया जाये,फिर उमंग-तरंग के साथ आगे बढ़ने में कोई बुराई नहीं है.

    सार्थक लेख.

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  9. कोई भी चीज अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होती.... !
    उपयोग करने पर निर्भर करता है , अच्छी या बुरी.... !!
    " अल्कोहल " तो कफ-सिरप में भी उपयोग किया जाता है.... !
    सुरसा ने अपना मुख का विस्तार बढ़ाइं ,ताकि वे मुक्ति पा सके.... !!
    बचने का एक ही रास्ता है कि संभल-संभल के कदम उठाया जाये,फिर उमंग-तरंग के साथ आगे बढ़ने में कोई बुराई नहीं है....
    अच्छी प्रस्तुति....

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  10. इन दिनों लोगों में फैली लोकप्रिय फेसबुकिया पापुलेरिटी को एक खतरनाक विमारी कह सकते हैं.इसे गैंग्रीन का बदला रूप कहें तो अनुचित न होगा हैं.जो शरीर,दिल-दिमांग और सोच पर कुंडली मारे बैठी है.

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  11. सच कहा आपने

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  12. वह शख्स जो अपने वास्तविक जीवन में अपनी अभिलाषा पूरी नहीं कर पाता वो क्या करे.............उसकी अभिलाषा पूरी नहीं हुई तो वह पागल हो जाएगा..............सो पूर्ण पागलपन से बचने के लिये फेसबुक में अपनी अभिलाषा पूर्ण होने का भ्रम पाल लेता है....कुल मिला कर आधा पागल तो हो ही जाता है........

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  13. सच में फेसबुक जैसी सामाजिक साईट पर सामाजिकता छोड़कर सब कुछ है ...सार्थक लेख ..सारी बातों से सहमती है........

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  14. यह मैंने २० अक्टुबर को राजेंद्र यादव जी के पोस्ट पर प्रतिक्रिया स्वरूप लिखा था. "फेसबुक-फेसबुक..!
    उमड़-घुमड़ रहे विचारों को दिशा दी है.
    नये पल्लवों को पुष्पित होने का मंच मिला है.
    पंखुड़ियों से निकलकर खुसबू ने बिखरना सीखा है.
    घोसलों से बाहर की दुनिया के हकीक़त को पहचानने का मार्ग दिया है.
    अबोध रचनाओं को नकारे जाने के जिल्लत से मुक्ति मिली है.हा..!
    कुछ मनचलों के फुहड़पना को भी पनाह मिल गया है.
    कुल मिलाकर देखा जाये तो पांचों अंगुली बराबर नहीं होती है.
    सकरात्मक और नकारात्मक पहलू से वास्तविक परख होती है.
    किसके मन में क्या है वो ऐसे ही कुछ जगहों पर उजागर होती हैं.
    मेरे ख्याल से पत्रकारिता के बदलते स्वरूप के रूप में देखना/आकलन करना गलत न होगा.."
    अब इसी बिंदु के दूसरे हिस्से पर लिखा है.जिन्हें यह लग रहा हो की एक तरफ़ा बात की गयी है तो उसे इन लेखों को भी पढना चाहिए..उम्मीद है अब आप सबको अपने-अपने प्रश्नों के उत्तर मिल गए होंगें..
    जबाब की प्रतीक्षा में---!

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  15. आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। सार्थक लेख.

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  16. bahut sarthak aur achchi prastuti....aabhar
    welcome to my blog :)

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  17. पूरी की पूरी एक पीढ़ी ही स्वतंत्रता के नाम पर विकृत रूप लेती स्वछंदता के कायल हैं.यह संकेत किसी भी तरह से ठीक नहीं कही जा सकती है.दोस्ती के नाम पर फूहड़ मजाक शगल बनता जा रहा है.क्रूरता के हद तक पहुच चुकी मानसिक विकृति बेहद शर्मनाक है......बहुत खूब...एक कट्टू सत्य।

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  18. सही विचारों की अभिव्यक्ति है

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  19. सही विचारों की अभिव्यक्ति है

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