'आने के बाद','जब चली गयी','अनदेखा','आघात''एक-एक करके'...!


           'आने के बाद'
देखा एक भयानक ख्वाब
धरती डोल रही,अम्बर पट खोल रही
लोग मदिरा में मदमस्त हैं
नये साल के बहाने पस्त हैं
आधुनिकता में सराबोर हैं
विदेशी भाषा-बोली का राज है
देशी संस्कृति की हासिये पर आज है
उत्सव के नाम पर ताम-झाम है
करते बवाल सरेआम है
बोलने पर आँख दिखाते
टोकने पर जान से मारते है
सबको क्या हो गया है
बुधि-विवेक जैसे खो गया है...!

'जब चली गयी'

जब वह गई दिल के सारे जज़बात ले गई
एहसास छोड़ धड़कने साथ ले गई
जब कभी फुरसत से तन्हाई में बैठते है
तेरे कुरबत की ख्वाहिश तडपाती है
बेवश हैं हम,लाचार तुम भी कम नहीं
पर!जुदाई के नाम से जलते हैं अरमान
एक तलब थी तुम कब जान बनी ?
इल्म न हुआ कब रूह से रूह एक हुई
तडप की आग ने जूझना सिखा दिया
मिलन की आस ने एक नया रास्ता दिखा दिया
किस मोड पर राहें टकराएँ,कैसे मिलेंगे पता नहीं
तेरे संग बीते लम्हों के साये में जिन्दा ख्वाब रहेंगे
बिछड़ने से बिखरती नहीं यादों के क्षण
जब भी मिलते हैं एक दुनिया रौशनी से जलने लगती है
लेकिन हमारे मिलने से अब कुढने लगी है इक दुनिया...
                  'अनदेखा'
प्रकृति की ये एक रचना अनोखी है
इसके बिन जीवन की कल्पना अधूरी है
अति से खत्म एक पल में सारी जिंदगानी
पानी से ही जीवन की अबिरल कहानी है
काट रहे हैं वृक्ष फिर भी उम्मीद करते है
इंच-इंच के फेर में तोड़ रहे खुद की डाली
अभी के खातिर कल को झुठला रहे हैं
खुद को देखते रहे बहुतों की छीनकर दाना-पानी
कितने मरहले हैं लेकिन सो रहे हैं बेच कर निशानी..
                   'आघात'
जो गली चौबारे कभी मेरे अपने थे
अब क्यों पराया से हैं
शदियों से जो अनजान,अजनबी थे
वो क्यों अपने से हैं
खास कोई बात नहीं,ऐसी कोई राज़ नहीं
फिर भी...
ऐसा क्यों एक सवाल है
जिसका सुझता कोई क्यों जबाब नहीं है
अब वो गलियों से गुजरते हैं बेगानों से
कौन सी रात,ऐसी बरसात हुई
जो अपनों के बीच बैठकर भी पहचान नहीं
किस बात की चोट है
जिसका इलाज एक रोग है
मुसाफिर हैं सब यहाँ
फिर ऐसे ख़ामोशी क्यों
जितना ढूँढा उतनी ही गहरी बात हुई
चलते-चलते भटक गए
इन चक्करों में उल्टा लटक गए
अंदर-बहार देखा घाव पर घाव मिले
मरहम की जगह एक छलाव जो आघात लगे ...
                    'एक-एक करके'
एक राज़ जो लबों से खेल रही है
एक आस जो दिलों से मिल रही है
एक विश्वास जो ह्रदय से जोड़ रही है
एक प्यार जो अपने को टटोल रही है
एक सपना जो अपना-अपना हिस्सा मांग रही है
एक ममता जो आँचल से लिपट रही है
एक मोती जो आँखों से छलक रही है
एक बादल जो काजल बन झलक रही है
एक पगड़ी जो दृढता से ललाट पर चमक रही है
एक क्षमता जो प्रतिभा से बढकर लड़ रही है
एक जीवटता जो कटूता को छाट रही है
एक लक्ष्य जो सागर को ताड़ रही है
एक भक्षक है जो रक्षक निगल रहा है
एक कलयुग जो सतयुग का बीन बजा रहा है
एक बिह्ववल ह्रदय जो मदमस्त हो गा रहा है
एक झोपड़ी जो खुशियों के झूठे हिंडोले में झूल रहा है.
एक चिराग का नाम देकर बेटा-बेटी में जो बाट रहा है
एक अंत हुआ है जो विद्रोह की बिगुल बजी रही है
एक पाखंड है जो से देश बदल रहा है
एक आडम्बर है जो अब अम्बर से खेल रहा है
एक भडंगी जो अपने बूते पर सबको तराजू में तोल रहा है
                                 डॉ.सुनीता








































2 comments:

  1. आपका लौट आना अच्छा लगा।
    आशा है बहुत अच्छा लगा होगा गाँव मे आपको।

    आपकी ये सभी कविताएं बहुत अच्छी लगीं।

    सपरिवार नववर्ष 2012 की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    सादर

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  2. sabhi rachna bahut hi achhi lagi lekin 'एक-एक करके' rachna bahut prabhashali lagi...jidangi ka katu anubhav samet diya aapki es rachna mein..
    sundar saarthak prastuti ke saath hi aapko spariwar navvarsh kee haardik shubhkamnayen!

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