रंगे-ए-जिंदगी !

          
डॉ.सुनीता 
17/04/2012 नई दिल्ली.

उल्टा तवा के भांति सृष्टि सृजन पलट दिया 
रुमाल फेंककर जिश्म-दर-जिश्म रौंद दिया.

कुकर्म के अदृश्य यातना से तन-वदन उबल पड़ा 
निगाहों के सामने पड़े आईने ने अपना चेहरा दिखा दिया.

उन्मत किरणें जब दस्तक दें दिल के दरवाजे पर 
दिखावा वो शर्म के झूठे अनंत चादर ओढ़ लेना.

आतीं हैं आती रहेंगी ये कान काटने
ये अदाएं ही जीवन में उत्कंठा बढ़ाती हैं.

जिसे सदैव समझा कोख का हिरा 
वक्त के नक्स पे निकला काला पत्थर.

दो रोटी के लानत-मलानत के लाले पड़े हैं 
कोढ़ में खाज सरीखा उठता यह सवाल है.

आरजू के तकसीम होने पर कली का खिलना 
मुरझाये होंठो का हंसना,मौसम का बदलना.

किस्मत के नाम पर किस्मत के मार से जूझते रहे 
जब कन्नी काटकर सब सामने से निकलते रहे.

वादे वफ़ा का दिलासा देकर जहां में घूमाते रहे
अपने ही दामन से किनारा कर गुफ्तगू करते रहे. 

गरीब के बेटी और गरीबी का मजाक उड़ाते रहे 
आजीवन जिसके दम कुर्सियां तोड़ते रहे.

भूले बैठे हैं हकीकत के अपनी औकात को 
गिरी आदमियत से अब खून खौलता है.

जिद के जद्दोजहद से खून सूखने लगा 
तनय की भूख दिन-ब-दिन बढ़ती रही.

दम्भ के सिंहासन पर बैठे-बैठे खींसे निपोरते रहे 
कर्मपथ से दगा कर लोक-परलोक में खाक छानते रहे.

ख़बर लेने की सुध-बुध बिसराये रहे
जब तक अहंकार की पट्टी आँखों पर चढ़ी रही.

रोज़-ब-रोज़ ख्याली पुलाव पकाते रहे 
मिटटी के तन को सोना समझ चुराते-छिपाते रहे.

खून-पसीने के कमाई को खुले हाँथ लुटाते रहे 
नादान बच्चे भूखे पेट सड़कों पर अकुलाते रहे.

खुशी के दिए नैनों में जगमगाते रहे 
उजाले में अंधेरे से ताजिंदगी टकराते रहे.

गजब ढाया अबोले,अदृश्य,अनुगूँज पाप ने 
छुटकारा पाने के लाखों-लाख जुगत लगाते रहे.

गाढ़े का साथी मेरा परछाई मुझसे दूर होता रहा
गाल बजाने की आदत से लाचार फटकार खाते रहे.

गले का हार समझकर सीने से चिपकाए रहे 
सर्प बनकर वह सरेशाम गुल खिलाता रहा.

गिरगिट सरीखे बदलते रंग से चौकते रहे
घर के अंदर दिलों में गाँठ-पर गाँठ पड़ते रहे.

रद्दे अमल से पीछा छुड़ाने की तरकीब लगाते रहे 
जितना भागते रहे उतना ही उसमें रचते-पगते रहे.

लड़कपन से गप्पे लड़ाने में दिन बिताते रहे 
सर आ पड़ी जिम्मेदारियां बगले झांकते रहे.

मौके के तलास में दिल-दिमाग खपाते रहे
जितना उबरने की सोचते उतना ही गहराई में धसते रहे.

जब भी देखा उसे अपने हाल-हालत से जूझते हुए 
घाव हरे हो गए अतीत के पन्ने खोलते हुए.

अनमोल मोती को पत्थर समझ फेकते रहे
जीवन भर घांस छिलते रहे शर्म खाते रहे.

अपनों के नजरों के मरकज का निशाना बनते रहे
आदत से वेबश करवट बदल सपने बुनते रहे.

घुटने न टेकने की सौगंध खाते,आगे बढ़ते रहे 
वे स्वाद घाट-घाट के पानी पीते,राह चलते रहे.

दामन जलाते रहे घर फूंक तमाशा देखते रहे 
निर्लज्जता की चादर लहराते,आगे कदम रखते रहे.

नोट-

इस रचना में मुहावरों का भरपूर प्रयोग किया गया है.
उम्मीद है,हिंदी के प्रति लगाव रखने वाले इसे सहज ही खोज सकेंगे.
वस्तुतः किस्से,कहानिया,कहावते और मुहावरे यह सब नित्य जीवन के अंग हैं.किसी न किसी रूप में हम सब इनका इस्तेमाल करते ही हैं.

8 comments:

  1. बहुत गहराई है इस नज्म में .........सुंदर

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  2. samay ki mang hae aaj ki aapki post bdhai.

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  3. गजब की नज़्म है।
    बेहतरीन।


    सादर

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  4. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,सुंदर मुहावरों का समावेश से मिश्रित अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना,...

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: कवि,...

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  5. कल 20/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. बहुत गहराई से आपने लिखा है --------बहुत सुन्दर

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  7. सरहनीय कविता है श्रमिक की यह आत्म-कथा।

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