मजबूर एक मजदूर  


डॉ.सुनीता 
01/04/2012,नई दिल्ली 

आज एक दिवस है 
कोई विवस,लाचार और बेकल है 
कुछ नहीं है उसके आटी में 
सब कुछ तलासते बीते माटी में 

उनके सपने अपने होने से रहे 
चाँद चढने की कुब्बत कभी रही नहीं 
रोटी की कीमत ही सदैव बढ़ी रही
मोती छूने की झूठी जिद कैसी
 
हमारे ही हड्डियों पर टिका है 
देश का एक-एक किला 
हमें ही कटघड़े में रखते हैं  
शर्म करो हे भेड़िये ! किस भ्रम में जिन्दा हो 

एक सवाल करता हूँ रोज़ खुद से  
बताओ मजदूर कौन है ?
मालिक कहने वाला या 
मलबे को टिकाये रखने वाला ?

सच बोलो झूठ से छलते हो न  
सभ्य होने का प्रतिपल ढोंग रचते हो 
असभ्यता को रोज़ फैलाते हो 
घृणा की नजर से हमें बुलाते हो 

पाप के भागी तुम हो 
नरक खलकामी हमें गोहराते हो  
नरभक्षी बने दिन-रात विचरते हो 
इंसा के लहू को रस लेके पीते हो 

अन्याय के प्रतिमूर्ति साफ नजर आते हो 
न्यायी होने के अक्सर दम्भ भरते,भहराते हो  
कौन,क्यों,किस रूप में कैसे यहाँ बटा है,समझाये ?
इस प्रपंच से कोई हमें मुक्ति दिलाये 

खारे जाल सा खरा पसीना  
उस पर हक़ जमाये बैठे हैं 
गरीब उन्हें कहते हैं 
हकीकत में स्वयं भिखमंगे हैं

युगों-युगों के कुर्बानी की 
अनमोल कीमत मारे बैठे हैं
हमारे हिस्से के सूरज दबाये रखे हैं  
तब कहीं अपने महलों के पाए जोड़े खड़े हैं 

नंगे वदन घुमरते हैं 
हमारे खुले वदन पर थूकते हैं 
जिस दम पर अभिमान करते हैं 
दरअसल में वह हमारी ताकत से अनजाने हैं

कर्मगति के स्वामी हम कहलाते हैं
बिन मान आजीवन अकुलाते हैं 
जूठन से जीवन की गाड़ी दौड़ाते है 
जुगाड़ से अपने पुरखों की लाज बचाते हैं   

नून,पानी और प्याज से भूख मिटाते हैं 
लोभ,मोह,मदिरा के सागर से दूर जाते-आते हैं 
सबका सहज सम्मान बढ़ाते हैं 
हम उसी से वंचित,ताउम्र तरसते रहते हैं 
लोगों खुद को किस मुख से मानव कहते हैं...

फरसा,कुदाली से जीवन को छिलते हैं 
छुटपन से जवानी तक चमड़े की झुरियां गिनते हैं 
झुकी हुई कमर की नसें फटतीं हैं 
लेकिन सांसों की लड़ियाँ कब रूकती हैं 
जिंदगी ढल के ढुलक जाती है तब रुकते हैं  

घर से निकलते हैं हम वे खौफ़
खाते हैं धूल,धुँआ और धूप 
पीते हैं पसीने,चापते हैं नगीने
पोत-पोत के आचार की फांकी कह लेते हैं छपनभोग 

बाँट दिया है हमारे हिस्से का मोती 
रोटी-रोटी की जुगत लगाते बीते युग 
संचार के साधन बदले,जीवन की धाराएँ हुई तब्दील 
कुछ नहीं हुआ कि रट लगाए विदा हुये सब...????

9 comments:

  1. आज के दौर मे एकदम सटीक उद्गार!

    सादर

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  2. बाँट दिया है हमारे हिस्से का मोती
    रोटी-रोटी की जुगत लगाते बीते युग
    संचार के साधन बदले,जीवन की धाराएँ हुई तब्दील,..

    बेहतरीन,सार्थक सटीक रचना,...

    MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

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  3. shi kha hae marmik post .aabhar.

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  4. आप की बातें सचमुच में उस तस्वीर की याद दिलाती हैं त्क्स्बरसों से हमारे देश में दिवस के नाम पर वही सब कुछ हो रहा है जो शताब्दियों पहले होता था . फरक सिर्फ तीन है की तस्वीर बदल गयी है.

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  5. आप की बातें सचमुच में उस तस्वीर की याद दिलाती हैं कि बरसों से हमारे देश में दिवस के नाम पर वही सब कुछ हो रहा है जो शताब्दियों पहले होता था. फरक सिर्फ इतना है कि तस्वीर बदल गयी है.

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  6. कल 04/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. कुछ नहीं हुआ कि रट लगाए विदा हुये सब...????
    बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ...

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  8. एक रोष के स्वर में लिपटी मजदूरों के जीवन की हकीकत बयान करती सशक्त रचना बधाई आपको

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