बदलते चेहरे और उभरते रूप


     मानवीयकरण का तब्दील होना मशीनीकरण में 


अब वह समय आ गया है जब हमें अपने इतिहास के स्वर्ण झरोखे से बाहर निकलकर हकीकत की ओर अपनी दृष्टि दौड़नी होगी.यदि सम्पूर्ण मीडिया समाज पर एक नजर दौडाएं तो गहराई से महसूस होता है कि आज के मीडिया ने भले ही न जाने कितने सारे स्वरूप धारण कर लिए हैं,लेकिन इसकी भूमिका को लेकर सवालिया निशान अब भी बरकार हैं.मौजूदा दौर में चौंधियाती ख़बरें सुकून नहीं दहसत पैदा करती हैं.

नए-नए दौर से गुजरते हुए पत्रकारिता ने लोगों को विशेष तौर पर आकर्षित किया है.इस आकर्षण के मोहपाश में बंधे हुए लोग खींचे चले आये.मीडिया क्षेत्र के लोक लुभावने दृश्यों ने सबको अपना दीवाना सा बना लिया.यह दीवानगी इस कदर बढ़ी की लोग अपने कर्तव्य,जबाबदेही और पारदर्शिता से ही विमुख होते चले गए.

इलेक्ट्रानिक मीडिया के दस्तक और दखल से इसमें एक अलग ही तेवर के दर्शन हुए.जहाँ पैसा,पावर,रुतबा और रसुक का बोलवाला हुआ.जिसने पत्रकारिता को एक अलग ही रूप से नवाजा है.हर रोज विकसित हो रहे नये-नये संसाधनों ने क्रांतिकारी परिवर्तन की दिशा में मजबूती से कदम रखने का प्रयास किया है.किन्तु अपने वस्तु-स्थिति पर कायम न रह सका.

न्यू मीडिया ने आते ही सबको अपने चंगुल में बांध लिया.दुनिया को अँगुलियों पर नचाने लगा.यह कहें तो सम्भवतः गलत नही होगा,क्योंकि जितनी सुविधाएँ बनाई गयी हैं,उतनी ही स्थिति भयावह बनती गयी है.

सर्वप्रथम किसी आविष्कार को लेकर जितनी उत्सुकता होती है उससे कहीं अधिक उसके द्वारा होने वाले दुष्परिणामों से लोग भय खाते हैं.जबकि उसकी जरुरत से खुद को कोई भी अलग नही रख पाते हैं.
पीढ़ियों के अंतराल हों चाहे न हों सबके सब इन माध्यमों के मकड़जाल में बंधे हुए हैं.जिसका प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही सहज रूप में देखे जा सकते हैं.

जिस तेजी से जनसंचार के क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकी ने अपना कदम बढ़ाया है.उससे चहुतरफा सूचना-क्रान्ति की लहर देखी जा सकती है.इस स्थिति ने जो माहौल पैदा किया है उससे हम सब मशीनी दुनिया में तब्दील होते जा रहे हैं.हमारी मानसिकता और दिल-दिमांग मशीनों के गुलाम बनते जा रहे हैं.एक तरह से कह सकते हैं कि मशीनों का आंशिक रूप से मानवीकरण हो गया है.जिससे इन निर्जीव वस्तुओं में निर्लिप्त होकर इंसान धीरे-धीरे मशीनीकरण में परिवर्तित हो रहा है.यह कोई अतिश्योंक्ति नहीं है.हम २४ घंटे में २० घंटे मशीनों के साथ गुजारते हैं.इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है.

संचार के परम्परागत परिभाषा और परिपाटी तेजी से बदले हैं.उसे परिवर्तित करने का श्रेय न्यू माध्यमों को दिया जा सकता है.लेकिन यह विचारणीय है कि इनके प्रभाव कितने सही हैं.आज अपने उम्र से बढ़कर बच्चे बातें करने लगे हैं.इन साधनों के शिकार सर्वाधिक यही हो रहे हैं.उनके मासूम बचपन हंसी-ठिठोली के स्थान पर तिकडम,साजिश और कालाबाजारी के समीकरण बनाने में व्यतीत हो रहे हैं.इसका साफ मतलब है हम अपने भविष्य को खोखला और कंडम कर रहे हैं.

सूचना के बढ़ते तकनीकी माध्यमों ने बहुत बढ़ी भूमिका निभाई है.आज रोज-ब-रोज मीडिया के नए रूप पल-प्रतिपल देखे जा सकते हैं.जिससे व्यापक स्तर पर बदलाब की बातें हो रही हैं.वह व्यवसाय में चली आ रही नीतियों में परिवर्तन की हो,शिक्षा से लगायत अनुसंधान को एक नए स्वरूप से विभूषित करने की बात हो,खेल से लेकर मनोरंजन तक में नए सिरे से उलट फेर करने की बात हो या फिर मानवीय मनोस्थिति में सुधार की ही बात क्यों न हो इस दिशा में काम किये जा रहे हैं.लेकिन सिर्फ कागजों में वास्तविकता में झोल ही झोल है.

इस दिशा में कुछ माध्यमों ने अपना एक अलग रोल अदा किया है.आजकल प्रचलन में आये ब्लॉग, फेसबुक, ट्विट्टर ,ई बुक, लिंक्ड आदि ऐसे तमाम साधन हैं जिनके दस्तक ने लोगों को एक अलग ही संस्थाओं से परिचित कराया है.

इन माध्यमों से नारी विमर्श के आयामों,दलित विमर्श के कारणों,गंगा के अपवित्रता पर मंथन और देश बचाने से लेकर रोटी-बेटी सहित जानवरों की सुरक्षा की बातें भी सहज ही उठाई जा रही हैं.

हालाकि मेल करने की शुरुआत अमेरिका में १९६९ में सरकारी,कार्यालयी देख-रेख के मद्देनजर शुरू की गयी थी.लेकिन इसने लोगों के अंदर अपनी एक मुकाम बना ली और गहरी पैठ के साथ आगे बढ़ी.

एक समय था जब प्रिंट मीडिया के द्वारा ही हम अपनी बात कह सकते थे या फिर अपने डायरी के पन्नों में दर्ज करके संतुष्ट हो जाते थे.किन्तु इन संसाधनों के आ जाने से सबको एक ऐसा मंच मिला है.जहाँ से वे अपनी बात,जज्बात,ख्याल को बड़ी बेबाकी से एक-दूसरे से बाँट सकते हैं.यहाँ पर न तो किसी से दुत्कारे जाने की टीस है और ना ही किसी के द्वारा अपमानित किये जाने की खीझ ही देखी जा सकती है.इसके आवक ने लोगों के अंदर एक आत्मविश्वास का संचार किया है. जिन्हें कोई दूसरा माध्यम नहीं मिला उन्होंने इसे अपनाकर अपने आप को साधुवाद प्रदान की है.कुछ एक अपवादों को छोड़कर.

कंप्यूटर ने सूचना के क्षेत्र जो विस्फोट किया था.उसे न्यू मीडिया ने परवान चढ़ाया है.जिसके विस्फोटक हमले से कोई भी नहीं बच पाया है.इसके वजह से पत्रों के प्रकाशन और पत्रकारिता से लगायत मीडिया के सभी माध्यमों को एक नया रंग, रूप और कलेवर प्राप्त हुआ है.

शुरुआती दौर में इसे एक 'यंत्र' के तौर ही उपयोग में लाया जाता रहा.लेकिन धीरे-धीरे इसने रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न हिस्सा का स्थान ले लिया.व्यक्ति के सुबह होने से लेकर नींद के आगोश में जाने तक लोग प्राय: प्रयोग करते हैं.

एक तरह से अपने लत्त के चपेटे में लेकर सबको कैद सा कर लिया.तमाम विरोध करने के बावजूद भी इसके गुलाम बने बैठे हैं.इस 'यंत्र' ने अब अपना एक अलग ही धाक बना ली है.अपितु अब यह एक यंत्र मात्र नहीं है,बल्कि मीडिया के ही एक रूप में ढल गया है.नित्य प्रति विस्तार धारण कर रहा है.

बेब-पत्रकारिता के पदापर्ण से एक अलग ही हलचल पैदा हुई.यह समूचे विश्व के लिए एक नई चीज है.जिसने सबको प्रभावित किया है.यह एक नए आयाम के जागरण का गवाह है.दुष्कर से दुष्कर कार्य को भी बेहद आसान बना दिया है.छपाई से लेकर शुद्धता तक को इसने प्रभावित किया है.

वस्तुत: सदियों से चली आ रही परिपाटी को बदलना ही तो सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी रास्ते से कायाकल्प की लहर प्रवेश करेगी.

छटते धुंध का मुखविर बनाना भी एक रोचकता और गौरव की बात है.उस स्थान पर यह अधिक मूल्यवान हो जाता है जहाँ से देश-दुनिया को बदला जा सकता है. संचार एक ऐसा साधन है जो लोगों के बीच में अपनी मजबूत पहचान रखती है. आजादी की लड़ाई से लगायत स्वतंत्रता के बजते बीन की साक्षी पत्रकारिता ही रही है.इसके आयाम ने बहुत ही विस्तार ले लिया है.लगातार वृहद होते स्वरूप ने ही मीडिया विशेषज्ञों को मंथन के लिए उकसाया है.

विश्व भर की तमाम खबरें घर बैठे उपलब्ध हैं.आज सब कुछ 'आन लाइन' मिल रहा है.अच्छी-बुरी,बेहतर,संजीदा,सुन्दर, भद्दा और डरावना से लेकर एक-एक चीज पलक झपकते हाजिर हो जाता है.एक तरफ हमें मानसिक जद्दोजहद से मुक्ति मिली है. दूसरी तरफ समझ,चिंतन और निर्णय लेने की क्षमता में घुन लग गया है.जिसने बुरी तरह से लोगों को प्रभावित किया है.

यहाँ से प्रिंट मीडिया की सूचनाएं भी आसानी से ली जा सकती है.'मुठ्ठी में कर लो दुनिया' के तर्ज पर लोगों ने 'हथेली पर दूब' उगाना शुरू कर दिया है.इन्टरनेट की सुलभता ने सब कुछ सुलभ कर दिया है.इस सहूलियत ने बहुतों को नक्कारा भी बनाया है.इस बात से हम मुख नहीं मोड़ सकते हैं.
कमोवेश सब कुछ मशीनों के हांथो में चला गया है.इलेक्ट्रोनिक रिपोर्टिंग, एडिटिंग, टाइपसेटिंग,डिजाइनिंग,प्रिंटिंग,ड्राफ्टिंग और प्रूफरीडिंग आदि जैसे बहुतेरे कामों को इन संसाधनों ने सर्वसुलभ कर दिया है.

ब्लोगिंग के समृधि ने इसे और अधिक प्रचारित,प्रसारित और वृहद कर दिया है.जो कुछ रह गया उस कसर को ई नेट्वर्किंग ने पूरी कर दी है.ग्लोबल इम्पैक्ट ने सबके सोचने-समझने के नजरिये में व्यापक तब्दीली की है.

मीडिया में ध्वनि,शब्दचित्र,धुआ,लेखन,कागज और करतूत को देखने के तौर-तरीके बदल गए हैं,ये सारी की सारी देन इन्ही की है.माना की इसकी खोज इंसान ने अपने सहयोग के लिए किया था.परन्तु स्थिति बदल गयी है.इसलिए इसका स्थान भी बदल गया है.
                        डॉ.सुनीता
                        अध्यापन      
                                            ०४/०४/२०१२  

9 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा है आपने...

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  2. बहुत सारगर्भित विवेचन...आभार

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  3. sarthak post jis par har kisee ko vichaar karna hoga .

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  4. बहुत सही लिखा है।


    सादर

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  5. बहुत बढ़िया सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

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  6. बदलते चेहरे और उभरते रूप ...
    बेहतरीन लिखा है आपने

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  7. सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट ।

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    1. सार्थक सृजन, आभार.
      कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नयी पोस्ट पर भी पधारें, आभारी होऊंगा.

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