एक खीझ


डॉ.सुनीता
असिसटेंट प्रोफ़ेसर नई दिल्ली
01/12/2012

मीठी धूप के एहसास में
खोये हुए अनसुने मार्ग पर चले
कांरवा साथ न था
लेकिन
उम्मीद के कई दीपक जल रहे थे
ठोकर मारते जमात को देखते हुए
दर्पण के धूल से उलझ पड़े
शिकवे की कई झाड़ियाँ लगीं
लेकिन
अनूठे जबाबों से चित्त पड़े
चतुराई ने हलके से एक गली पकड़ी
चौराहे से आँख बचाकर भाग खड़े हुए
कहीं कोई एक टुकड़ा गर्मधूप के मांग न लें
लेकिन
उसके इस भगौड़ेपन से वाकिफ
पकड़ लिया जकड़ के बाजुओं के जबड़े में
स्त्री के गाँठ बांधे आंचल के एक कोने में
जब तक जिआ उसे स्नेह के सम्मोहन के मोहपास में
गठिया लिया उस दम तक के लिए
लेकिन
उस एक दरार ने दरख्त के ऊँचाइयों से
झांकते सूरज को सूखे टहनियों में कैद कर लिया
यह कहते हुए
यह अबला के प्यार का बंधन नहीं है
बल्कि वृक्ष के जड़ों में जमे जमीं कि
सख्त पकड़ है
लेकिन
वह अनंत आसमानों में आँख मिचौली
खेलता रहा जीवन के एक हर पड़ाव से
कुछ उलहने देते हुए खीझ उठता है
मेरी फ़िक्र है किसी को
जैसे स्त्री ने चीत्कार किया हो पहली बार
एक पल को
पर्वत,पवन और पानी भी थरथरा उठे


4 comments:

  1. बेहद संवेदनशील प्रस्तुति
    अरुन शर्मा
    www.arunsblog.in

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  2. गहन संवेदनशील प्रस्तुति ***** वह अनंत आसमानों में आँख मिचौली
    खेलता रहा जीवन के एक हर पड़ाव से
    कुछ उलहने देते हुए खीझ उठता है
    मेरी फ़िक्र है किसी को
    जैसे स्त्री ने चीत्कार किया हो पहली बार
    एक पल को
    पर्वत,पवन और पानी भी थरथरा उठे

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