महिला मुद्दे और ब्लॉग

तृतीय भाग-

(हम वह सीताएं हैं जिन पर राम और रावण दोनों ने बराबर अत्याचार किया है. से आगे पढ़ें...)



शोषण की कहानी पर अभी तक कोई अंकुश नहीं लगा है.मासूम बच्चों के साथ खूंखार भेडिये की तरह टूट पड़ने वालों की जमात मुर्दा दिल लिए समाज में खुल्ले घूम रहे हैं.सच तो यह की एक नारी की दुनिया पेट के भौगोलिक परिधि में ही सिमट के रह जाती है.जो इससे विद्रोह करतीं हैं उसके ऊपर समाज के फतवे की औंधी तलवार लटका के छोड़ दी जाती है.
संचार पत्रों में व्यपार के लिए,विज्ञापन में बाज़ार प्राप्त करने हेतु,फिल्म में पैसे बनाने के लिए,साहित्य में पुरस्कार बटोरने के केन्द्र में महिलाएं,किसान और बिलबिलाते मासूम बचपन को ध्यान में रखा जाता है.जो जितना अधिक धन उगाहने में योगदान देगा उसे उतनी ही लोकप्रियता मिलती है.साहिर लिखते हैं-ये कूचे,ये नीलाम घर बेकसी के.मजरूह फरमाते हैं-हर निगाह उठती है खरीदार की तरह.दिन के उजाले में उजले दिखने वाले चेहरे राते के अँधेरे में भयानक हो जाते हैं.
स्त्रियां विमर्शों के नाम पर लोकप्रियता बटोरने के माध्यम के रूप में इस्तमाल होती हैं.महिलाएं टूटती,तडपती.बिलखती और लड़ती हुई दिख जाती हैं.लेकिन हकीकत के जमीन पर उनके पर कतर दिए गए होते हैं.
इन दिनों मीडिया के रुप-स्वरूप में दिनों-दिन परिवर्तन होने लगे हैं.सोशल मीडिया और न्यू मीडिया ने कहर सा मचा रखा है.गाँव,देहात से लगायत छोटे-छोटे शहरों और महानगरों तक इसके चर्चे हैं.सोशल मीडिया ने आम-आवाम को अभिव्यक्ति का एक बहुत ही बड़ा मंच दिया है.
प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वतंत्र और निहायत स्वछन्द विचारों को वेबाकी से रख रहे हैं.
दुनिया,जहाँ के समस्त मुद्दों पर अपने अच्छे-बुरे अनुभवों को साझा करते देखे जा सकते हैं.
मेरे हिसाब से यह एक नेत्रपुस्तिका,मुपुस्तिका,शब्द पुस्तिका,विचार पुस्तिका,विवरण पुस्तिका,विभेद पुस्तिका,चित्रपुस्तिका और अनलिंगी पुस्तिका  के तौर पर देश-दुनिया में अपनी एक अलग मुकाम बनाने में सफल रही है.
इन साधनों को अपने मन मुताबिक प्रयोग करने वालों की एक लम्बी लाइन है.मल्टीनेशनल कम्पनियों से लेकर उपभोक्ता तक इसके कायल हैं.सत्ता से सरकार तक इसके ताकत से वाकिफ हैं.इसके उदाहरणों की लिस्ट भारी भरकम हैं.
एक शोध के मुताबिक ब्रिटेन में आम चुनाव अभियान के दौरान ६०० राजनीतिक उम्मीदवार ट्विटर से जुड़े थे.इनके अलावा सैकड़ों पत्रकार और पार्टी कार्यकर्ता भी सोशल मीडिया से जुड़े थे.ब्रिटेन की नई संसद के करीब २०० सदस्य ट्विटर पर सक्रीय हैं.इनमें से पांच तो कैबिनेट मंत्री भी है.
वाल स्ट्रीट कब्ज़ा और अन्ना आंदोलन,हुस्नी मुबारक और सालेह सहित गद्दाफी के अतिरिक्त राजशाहों के गद्दी तक इसकी अनुगूँज सुने जा सकते हैं.
धर्म,आस्था और आडम्बर पर कटाक्ष करते लोगों की एक अलग ही जमात है.जो धीरे-धीरे एक फ़ौज का शक्ल इख्तियार करती जा रही है.सोशल मीडिया से खौफ खाती सत्ताएं इसके ताकत के एहसास को पचा नहीं पा रही हैं.इसके मर्केटिंग क्षमता से वाकिफ लोग इसका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं.
चौपटस्वामी नामक ब्लॉगर की लिखी यह टिप्पणी पढ़िए- “(हमारे यहाँ)धनिया में लीद मिलाने और कालीमिर्च में पीते के बीज मिलाने को सामजिक अनुमोदन है.रिश्वत लेना और देना सामान्य और स्वीकृत परम्परा है.उसे रीती-रिवाज के रूप में मान्यता प्राप्त है.कन्या भ्रूण की हत्या यहं रोजमर का कर्म है और अपने से कमजोर को लतियाना अघोषित धर्म है.गणेश जी को दूध पिलाना हमारी धार्मिक आस्था है.हमारा लड़का हमें गरियाये और जुतियाये हुए भी श्रवणकुमार है,पर पड़ोसी का ठीक-ठाक लड़का भी बिलावजह दुष्ट और बदकार है.
यानी कि सौ फीसदी अभिव्यक्ति की एक सौ एक फीसदी आज़ादी !”  

इस दिशा में ब्लॉग की भूमिका सर्वोपरी है.ब्लॉग लिखने वालों की बहुत बड़ी तादाद है.इस क्षेत्र में बी.बी.सी से लगायत हर बड़े-छोटे अखबार,पत्रिका और ई-पत्रिका की भूमिका अहम है.इस पर बहुत से नामचीन लेखक भी लिख रहे हैं.रवि रतलामी छींटे और बौछारे के माध्यम से एक नया मंच तैयार किया है.बालेंदु शर्मा वाह मीडिया के द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नई पहल करते देखे जा सकते हैं.नए लेखक,नए तेवर के दर्शन नित्यप्रति कर सकते हैं.ब्लॉग भी आलकल दिन,सप्ताह और वर्ष के रूप में आने लगे हैं.
ब्लॉगिंग एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी ऐसा माध्यम जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त,और राजनैतिकसामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है.जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है,न अल कायदा से डरने को.इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है,न सर्कुलेशन की कमी,न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रियाओं का इंतजार करने की जरूरत.त्वरित अभिव्यक्ति,त्वरित प्रसारण,त्वरित प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी प्रसार के चलते ब्लॉगिंग अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गई है.ब्लॉगों की दुनिया पर केंद्रित कंपनी 'टेक्नोरैटी' की ताजा रिपोर्ट (जुलाई २००७) के अनुसार ९.३८ करोड़ ब्लॉगों का ब्यौरा तो उसी के पास उपलब्ध है.ऐसे ब्लॉगों की संख्या भी अच्छी खासी है जो 'टेक्नोरैटी' में पंजीकृत नहीं हैं.समूचे ब्लॉगमंडल का अकार हर छह महीने में दोगुना हो जाता है.सोचिए आज जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं,तब अभिव्यक्ति और संचार के इस माध्यम का आकार कितना बड़ा होगा?
इस दुनिया में दखल रखने वालों में नौसिखुओं से लेकर मझे हुए विद्वानों के अपने-अपने ब्लॉग हैं.जिसके द्वारा सभी लोग उन तमाम मुद्दों पर लिख रहे हैं,जो समाज में जड़ जमाए युगों-युगों से मौजूद है.
विद्वानों के अंदाज़ में कहें तो- आइए फिर से अभिव्यक्ति के मुद्दे पर लौटें,जहाँ से हमने बात शुरू की थी.हालाकिं ब्लागिंग की ओर आकर्षित होने के और भी कई कारण हैं लेकिन अधिकांश विशुद्ध,गैर-व्यावसायिक ब्लागरों ने अपने विचारों और रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए ही इस मंच को अपनाया.जिन करोड़ों लोगों के
पास आज अपने ब्लॉग हैं,उनमें से कितने पारम्परिक जनसंचार माध्यमों में स्थान पा सकते हैं..?
स्थान की सीमा,रचनाओं के स्तर,मौलिकता,रचनात्मकता.महत्व.सामयिकता आदि कितने ही अनुशासनों में निबद्ध जनसंचार माध्यमों से हर व्यक्ति के विचारों को स्थान देने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है.लेकिन ब्लागिंग की दुनिया पूरी तरह स्वतंत्र.आत्मनिर्भर और मनमौजी किस्म की रचनात्मकता की दुनिया है.वहाँ आपकी 'भई आज कुछ नहीं लिखेंगे' नामक छोटी सी टिप्पणी का भी उतना ही स्वागत है
जितना की जितेन्द्र चौधरी के ओर वर्डप्रेस पर डाली गई सम्पूर्ण 'रामचरित्र मानस' का.'भड़ास' नामक सामूहिक ब्लॉग के सूत्र वक्य से यह बात स्पस्ट हो जाती है...
"कोई बात गले में अटक गई हो तो उअग्ल दीजिए मन हल्का हो जायेगा."
महिलाओं को ध्यान में रखते हए लिखने वालों कि संख्या अनगिनत है.घर-परिवार को सम्भालते हए भी अपनी मौजूदगी से सबको सम्मोहित करने वाली महिलाओं  की तताद लम्बी है.उनमे से कुछ बेहद चर्चित भी है.अभी कुछ दिन पहले ही २७ को फर्गुदियाग्रुप के महिलाओं ने कम उम्र में होने वाली शादियों उसके के द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने वाली महिलाओं पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया था.यह भी एक ब्लॉग है जो महिलाओं के लिए विशेष तौर पर काम करती हैं.इसकी मुखिया शोभा जी कहती हैं—“इंटरनेट से जुड़ा ब्लोगिंग एक ऐसा माध्यम है जिससे हम घर बैठे देश में ही नहीं विदेश में भी पहुंचा सकतें हैं.मेरे जैसी गृहणी ने जब इंटरनेट की दुनिया में कदम रखा तो ब्लॉग के जरिये जहाँ मुझे समाज का प्रगति करता चेहरा नज़र आया वहीँ कुछ ऐसी झकझोर देने वाली बुराइयाँ भी सामने आयीं जिससे मैं अनभिज्ञ थी.
हमारे आस-पास ऐसा बहुत कुछ घटित हो रहा होता है जिसकी जानकारी प्रिंट मिडिया या इलेक्ट्रोनिक मिडिया तक नहीं पहुंचती है,अगर कोई पहुँचाना भी चाहे तो जरुरी नहीं है की अख़बार के संपादक उसे छापें या न्यूज़ चैनल वाले उसे दिखाएँ,इसके लिए उनकी अपनी कुछ शर्तें और नियम होतें हैं ,ऐसे में ब्लॉग एक ऐसा मंच है जिसके माध्यम से हम अपने विचार सभी तक पहुंचाने के लिए स्वतंत्र हैं. 
शेष अगले भाग में ....


महिला,मुद्दे और  ब्लॉग 

द्वितीय भाग
(मात्र चार साल से आगे पढ़ें...)

ब्लॉग परिक्रमा के अनुसार आज ब्लॉग,विश्व की हर भाषा में, हर कल्पनीय विषय मैं लिखे जाने लगे.ब्लॉग को विश्व के आम लोगों में भारी लोकप्रियता तब मिली जब अफ़गानिस्तान पर अमरीकी हमले के दौरान एक अमरीकी सैनिक ने अपने नित्यप्रति के युद्ध अनुभव को ब्लॉग पर नियमित प्रकाशित किया.उसी दौरान एंड्रयू सुलिवान के ब्लॉग पृष्ठ पर आठ लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति दर्ज की गई,जो संबंधित विषयों के कई तत्कालीन प्रतिष्ठित प्रकाशनों से कहीं ज़्यादा थी.एंड्रयू अपने ब्लॉग के मुख्य पृष्ठ पर लिखते भी है कि क्रांति महज ब्लॉग में दर्ज होगी.
अब चर्चित ब्लॉगों की संख्या अनगिनत है.इनके मुद्दे घर से बहार,देश से दुनिया तक के विस्तार लिए हुए हैं.
ब्लॉग परिक्रमा के विश्लेषण के मुताबिक हिंदी ब्लोगिंग के शैशव काल ( वर्ष -2003 से 2007के मध्य ) के दौरान जगदीश भाटिया, मसिजीवी,आभा,बोधिसत्व, अविनाश दास,अनुनाद सिंह,शशि सिंह,गौरव सोलंकी,पूर्णिमा वर्मन,अफ़लातून देसाई,अर्जुन स्वरूप,अतुल अरोरा,अशोक कुमार पाण्डेय,अतानु दे,अविजित मुकुल किशोर,बिज़ स्टोन,चंद्रचूदन गोपालाकृष्णन,चारुकेसी रामदुरई,हुसैन,दिलीप डिसूजा,दीनामेहता,डॉ जगदीश व्योम,-स्वामी,जीतेंद्र चौधरी,मार्क ग्लेसर,नितिन पई,पंकज नरूला,प्रत्यक्षा सिन्हा,रमण कौल,रविशंकर श्रीवास्तव,शशि सिंह,विनय जैन,वरुण अग्रवाल,सृजन शिल्पी,सुनील दीपक,नीरज दीवान,श्रीश शर्मा,जय प्रकाश मानस,अनूप भार्गव,शास्त्री जे सी फिलिप,हरिराम,आलोक पुराणिक,समीर लाल समीर,ज्ञान दत्त पाण्डेय,रबिश कुमार,अभय तिवारी,नीलिमा,अनाम दासकाकेश,मनीष कुमार,घुघूती बासूती,उन्मुक्त जैसे उत्साही ब्लोगर हिंदी ब्लोगिंग की सेवा में सर्वाधिक सक्रिय रहे.

आज अधिकांशतः व्यक्ति का एक अपना ब्लॉग है.जहाँ पर वह अपनी हर बात को वेबाकी से कहते दिखाई देते हैं.अपर्णा मनोज,शोभा द्विवेदी,विपिन चौधरी,अंजू शर्मा,सुशीला पूरी ये ऐसे ब्लोगर है जो एक कुशल गृहिणी के साथ-साथ लेखन के क्षेत्र में दखल रखती हैं.
मेरे जाँच-पड़ताल का नतीजा ये रहा है कि २०८ ऐसे ब्लॉग हैं,जो महिलाओं के द्वारा लिखा जा रहा है.यह कोई बड़ी हस्ती नहीं हैं,बल्कि घर-परिवार सम्भालने वाली स्त्रियां हैं.जो अपने दिन-चर्या के कामों से निपटकर देश-दुनिया पर अपने मन के सहज,सरल और चुभती घटनाओं और मुद्दों को साझा करती हैं.हालंकि बहुत सी महिलाएं लिख रही हैं.लेकिन एक गृहिणी होते हुए अपने मौजूदगी का आभास बनाए रखने वालों की संख्या सीमित है.
अंजू शर्मा कहती हैं पहले के लेखक और विद्वतजन के नजर में यह एक बाहियात मंच है.लेकिन मुझे लगता है यह एक ऐसा माध्यम है जहाँ से हम अपनी बात बड़ी ही सहजता और कुशलता से रख सकते हैं. 
विपिन चौधरी कहती हैं यही एक ऐसा स्थान है जहाँ से हम अपने दिल की बात कहते हुए भय नहीं खाते हैं.इसी के माध्यम से बहुत से ऐसे प्रतिभाशाली लोगों से रु-ब-रु होने का अवसर भी मिला है.जो की प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से शायद ही मिल पाते.दूर-दराज के गांवों में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार की दुर्दांत व्यथा-कथा की जानकारी और जायजा लेने का एक आसान जरिया मिला है.यह फेसबुक और ट्विटर पर भी लागू होता है.
इनके प्रयोग से चीजों को छिपाना बेहद मुश्किल हो चला है.चाह कर भी कोई इससे अपनी गोपनीयता नहीं छिपा सकता है.
वेशक पत्रकारिता ने समाज के ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन में महती भूमिका निभाई है.शुरूआती दिनों में पत्रकारिता के जिम्मे देश की आजादी की सबसे
बड़ी चुनौती थी.इसके माध्यम और मिशन दोनों ही परिस्थितियों के अनुकूल थी.
समय के साथ इसमें बहुत सारे बदलाव होते गये. 
कागज़-कलम की पत्रकारिता एक नए कलेवर के साथ लोगों के समक्ष मौजूद है.इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता के दखल से सुंदर,सुसज्जित और सरल पत्रकारिता का वर्चश्व बढ़ा है.
इन्टरनेट के आगमन से सम्पूर्ण समाज पर द्रुतगति से एक अलग ही प्रभाव पड़ा है. जिस तेजी से इंटरनेट ने अपने पंख पसारने शुरू किये.इससे आभास होने लगा है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक बदलाव की लहर एक बवंडर सरीखा साबित होने वाला है.ऐसा ही हुआ नए-नए माध्यमों का प्रभाव क्रांतिकारी अंदाज़ में पड़ा है.
मीडिया के दुनिया में एक नए दस्तक से लोग रु-ब-रु हो रहे हैं जिसके परिप्रेक्ष्य में बहुत से लोग अपनी अहम और सक्रीय भूमिका अदा कर रहे हैं.
ऐसे ही एक नाम है यशवंत माथुर जी का जो की अपने नयी पुरानी हलचल के माध्यम से नए-से नए और नौसिखुए लेखकों को एक बेहतर मंच देने में लगे हुए हैं.वह कहते हैं-ब्लोगिंग एक ऐसा मंच है जहां आप लेखक,संपादक और पाठक की भूमिका निभाते हैं.एक लेखक के तौर पर मनचाहा लिखने की आज़ादी पाते हैं, संपादक के तौर पर अपने ही लिखे को संशोधित करने और एक से अधिक बार पूर्वावलोकन करने की आज़ादी पाते हैं.वहीं एक पाठक के तौर पर आपको दूसरों के लिखे पर तत्काल प्रतिक्रिया देने और उस पर अपने विचार रखने की भी पूरी आज़ादी होती है.आज लगभग हर विषय पर,हर भाषा मे ब्लोगस उपलब्ध हैं,कुछ के बारे मे हम जानते हैं और कुछ से अभी हम अनजान हैं.यदि भारतीय और विशेष रूप से हिन्दी ब्लोगिंग के संदर्भ मे बात करें तो मेरे विचार से अभी ब्लोगिंग मे बहुत कुछ होना बाकी है.”
यही बहुत कुछ होने का संकेत ही विकास को नए आयाम देते हैं.
हिन्दी ब्लोगिंग पर भी जातीयता,क्षेत्रीयता,
 सांप्रदायिकता और नये तथा तर्कसंगत विचारों को को उभरने से रोकने की मानसिकता जिस तरह से हावी होती जा रही है वह निश्चित तौर पर सामाजिक उत्थान के लिये अच्छा नहीं है.ब्लोगिंग का उदेश्य परिवर्तनकारी दृष्टिकोण को अपनाना,और चेतना जगाने वाला होना चाहिये जबकि इससे भटक कर अधिकांश ब्लोगर्स जहां प्रेम गीतों के रस मे डूब कर वाह-वाह की तालियाँ बटोर रहे हैं वहीं ऐसे ब्लोगर्स को उपेक्षित और तिरस्कृत किया जा रहा है जिनका उद्देश्य वास्तव मे सामाजिक कल्याण है. 
एक सफल ब्लॉग या ब्लॉगर की परिभाषा उस पर आने वाली टिप्पणियों तक सीमित कर दी गयी है जबकि ब्लॉग की सफलता या असफलता का पैमाना उस पर उपलब्ध विषयवस्तु की गुणवत्ता पर आधारित होनी चाहिये.आवश्यकता इस बात की है हम गूगल और वर्डप्रेस द्वारा उपलब्ध कराई जा रही इस मुफ्त की सुविधा का अधिकतम सदुपयोग कर सकें.”
वैश्विक परिदृश्य पर एक नजर दौडाई जाये तो इसके गहराई का थाह सहज ही मिल सके.सर्वोत्कृष्ट कोटि के ब्लॉगों में अपनी पहचान को एक पुख्ता आधार दिया है.जानकीपुल,सृजनगाथा,सबलोग,मोह्हला,नारी,उड़ान अंतर्मन की,नुक्ता चीनी,हमारीवाणी,अपनी माटी जैसे तमाम ब्लॉग और ब्लागर सक्रिय हैं.इन पर लिखे मुद्दे न केवल चर्चा का विषय हैं बल्कि इनको एक नए नजरिये से देखा-परखा भी जाता है.
वरिष्ठ ब्लॉगर अनूप शुक्ला (फुरसतिया) कहते हैं... अभिव्यक्ति की बेचैनी ब्लोगिंग का प्राण तत्व है और तात्कालिकता इसकी मूल प्रवृति है.विचारों की सहज अभिव्यक्ति ही ब्लॉग की ताकत है,यही इसकी कमजोरी भी.इसकी सामर्थ्य है,यही
इसकी सीमा भी.सहजता जहाँ खत्म हुई वहाँ फिर अभिव्यक्ति ब्लागिंग से दूर होती जायेगी.   
कमोवेश यह बातें सही और सत्य प्रतीत होती हैं.अति का अंत सुनिश्चित है.लेकिन स्त्री के संदर्भ में यह बातें वेमानी जान पड़ती हैं.
पाखीके सम्पादकीय में प्रेम भारद्वाज जी लिखते हैं हमारी आज़ादी पर तुलसी दास ने पञ्च सौ साल पहले ही यह कहकर बंदिश लगाई थी-जिमि स्वतंत्र होई बिगरहिं नारीहमने जब भी आज़ादी चाही,उड़ने की कोशिश की,लक्ष्मण रेखा लांघी.हमें बदचलन कहकर रूप से तोड़ने की कोशिश की गयी.सीता की तरह अपहरण कर लिया गया...हम वह सीताएं हैं जिन पर राम और रावण दोनों ने बराबर अत्याचार किया है.

शेष अगले दिन....

महिला,मुद्दे और ब्लॉग 

डॉ. सुनीता

नोट-यह एक शोधपत्र है.जो ‘विकास और मुद्दे’ नामक पुस्तक में छपी है.
आज से इसे मैं अपने ब्लॉग पर टुकड़े-टुकड़े करके पोस्ट कर रही हूँ.


प्रथम भाग 

साड़ी पहनो
लड़की बनो
वीवी बनो
वे कहते हैं
पढ़ाई करने वाली बनो
बाबर्ची बनो
झगड़ालू बनो नौकरों के प्रति
उपयुक्त बनो,
आह
हिस्सा बनो
सांचों में ढालने वाले चीखे
               (कमला दास : डी ओल्ड प्ले हाउस )

समाज चाहे जिस दौर का रहा हो स्त्री से इसी तरह के अपेक्षाएं रखता रहा है.जिसे उसे मानना ही पड़ता है.राजी-खुशी या फिर मन को मसोस के ही क्योंकर न उसे स्वीकारना ही पड़ता है.
आज २१ वी. सदी में जी रहे लोगों की दकियानुसी सोच में बहुत फर्क नहीं आया है.घर-परिवार के इज्जत,मान,सम्मान और परम्परा के रखवाली की जिम्मेदारी इनके ही कंधे पर टिकी है.युगों-युगों से भूख-गरीबी के निवारण और मुक्ति के लिए एक बेटी ही क्यों बेची जाती है.?
यह अक्षुण प्रश्न अपने स्थान पर कायम है.जबकि इनके उद्धार के नाम पर बहुत सारी दुकाने फल-फुल रही हैं.
समय-समय पर समाज-सुधारकों ने इसका वीणा उठाया है.इसी को ध्यान में रखते हुए १८५७ के दौर में बाल-प्रबोधनीऔर स्त्री-प्रबोधनी जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से एक सतत प्रयास किया गया था.
१८८२ में सीमंतनी उपदेश नामक एक किताब के द्वारा स्त्री के दर्द को लोगों के बीच पहुचाने का जरिया बनाया गया था.जिसे धर्मवीर भारती ने प्रकाशित करवाया.इसकी ३०० प्रतियाँ लोगों में बांटी गयी थी.७-८ मार्च १९९१ में प्रगतिशील महिला मंचका निर्माण किया गया.इसी साल के आखिर में आधी जमीन नाम की त्रैमासिक पत्रिका की शुरुआत की गयी.इस के सहयोग से देश के तीन राज्यों में एक-एक पत्रिका का शुभारंभ किया गया.बंगाल में प्रतिविधान’, असम में जोनाकी बाटऔर तमिल में सूर्योदयाके साथ देश में एक व्यापक बदलाव की मुहीम छेड़ी थीं.
१९९४ में अलग-अलग देश से आई हुई महिलाओं के सहयोग से दिल्ली में अखिल भारतीय महिला एसोसियेशन (ऐपवा)की नींव रखी गयी.
दुनिया के चेहरे का रंग रोज नए कलेवर से सुसज्जित होते दिखाई देते हैं.पत्रकारिता के दुनिया में नित्य नए बदलाव की एक सघन लहर आती है.जहाँ से परिवर्तन की एक नयी किरण फुट पड़ती है.परिवर्तन के प्राकृतिक गुण इसके अभिन्न अंग हैं.आज के अत्याधुनिक माध्यमों से सामाजिक सरोकार को अभिव्यक्ति का एक मारक मंच मिला है.जिसके माध्यम से हर आम व्यक्ति खास तौर से जुडकर आत्मतोष प्राप्त कर पा रहा है.
स्त्री के संदर्भ में प्राकृतिक गुणों की दुहाई हमेशा ही दी जाती रही हैं. प्राकृतिक अनिवार्यता के तहत स्त्री की परिभाषा देह है जिसका प्रकृतिक उद्देश्य मातृत्व है.देह का उपभोक्तावाद,सौंदर्य का औद्योगीकरण,मातृत्व का कर्मकांड,यौन शुचिता,सती और वैधव्य महोत्सव जैसी अन्य अनेक मुल्यान्वित प्रथाएँ मात्र ऐतिहासिक गढंत है.
समाज में व्याप्त बुराइयों पर गहरे कटाक्ष के प्रतिपक्षयी रूप निरंतर देख सकते हैं.मुख्य रूप से भ्रष्टाचार,अशिक्षा,असमानता और महिलाओं से जुड़े मुद्दे सर्वाधिक देखने को मिलते हैं.
घर के चार दिवारी के अंदर शोषण के गीत रचने वाले भी न्यू मीडिया के अंगनाई में राग भैरवी की तान छेड़ते नजर आते हैं.न्यू मीडिया के आ जाने से एक नए तरह के सक्रियता को देखा जा सकता है.इसके रंग-रूप,स्वरुप और चेहरे बहुरंगी हैं.
हम पुरातन संचार के कंधे पर सवार होकर न्यू माध्यम के रंगीन चौखट पार करके अपनी एक पैठ और पहचान बना रहे हैं.इसमें स्त्री-पुरुष की समान सहभागिता देखी जा सकती है.जब हम नए संसाधनों की बात करते हैं.उसमें सोशल मीडिया,न्यू मीडिया और ब्लॉग का नाम जुबा पर सबसे पहले आता है.इन नए साधनों ने घर बैठे व्यक्ति को भी एक अभिव्यक्ति का स्वतंत्र मंच दिया है.किसी भेदभाव के भावना  से रहित.
जब हम ब्लॉग की बात करते हैं तो सबसे पहले ध्यान इस बात पर जाता है कि इसकी उत्पत्ति का केन्द्र और मुद्दा क्या रहा है?इस संदर्भ में कुछ तथ्य खुलकर सामने आते हैं.देखा जाए तो ब्लॉग शब्द के शुरुआत की कहानी बेहद रोचकता लिए हुए है.
इस शब्द को 1999 में पीटर मरहेल्ज नाम के शख्स ने ईजाद किया था. सबसे पहले जोर्न बर्जर ने 17 दिसंबर 1997 में वेबलॉग शब्द का इस्तेमाल किया था.इसी को पीटर मरहेल्ज ने मजाक-मजाक में मई-1999 को अपने ब्लॉग ‘पीटरमी डॉट कॉम’ की साइड बार में वी ब्लॉग कर दिया. बाद में वी को भी हटा दिया और 1999 में ब्लॉग शब्द आया.हिंदी ब्लोगिंग की शुरुआत 02 मार्च 2003 को हुई थी और हिंदी का पहला अधिकृत ब्लॉग होने का सौभाग्य प्राप्त है नौ दो ग्यारह’ को.
इस तरह से पत्रकारिता के इतिहास में ब्लॉग का प्रवेश एक नए युग और तेवर की तरह हुआ है.इसे आये हुए बहुत दिन नहीं हुए हैं.लेकिन लोगों के मध्य इसकी एक अलग ही पहचान बन गयी है.हर किसी के जुबान पर इसके चर्चे सुनने को मिल जाते हैं.इसके प्रारम्भिक दौर में लोगों की भूमिका अहम रही है.
'ब्लॉग' वेब-लॉग का संक्षिप्त रूप है,जो अमरीका में '1997' के दौरान इंटरनेट में प्रचलन में आया.प्रारंभ में कुछ ऑनलाइन जर्नल्स के लॉग प्रकाशित किए गए थे, जिसमें जालघर के भिन्न क्षेत्रों में प्रकाशित समाचार,जानकारी इत्यादि लिंक होते थे,तथा लॉग लिखने वालों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ भी उनमें होती थीं.इन्हें ही ब्लॉग कहा जाने लगा.
ब्लॉग लिखने वाले जाहिर है,ब्लोगर कहलाने लगे.प्राय: एक ही विषय से सम्बन्धित यह संकलन ब्लॉग तेजी से लोकप्रिय होता गया.ब्लॉग का सूचनाओं और आकडों से गहरा जुडाव था.
शुरू के दिनों में इसके खास भाषा की जानकारी होना बेहद जरुरी था. लेकिन प्रबुद्ध लोगों के कुशल प्रयास के माध्यम से इस खास से भी सबको मुक्ति मिल गयी.
ब्लॉग के ताकत और लोकप्रियता को देखते हुए भाषा से सम्बन्धित समस्यायों को हल कर दिया गया जिससे यह सर्वसुलभ हो सका.आज पल में देखते ही देखते '1997-98' के महज़ दर्जन भर ब्लॉग की संख्या बढ़कर दस लाख से अधिक का आँकड़ा पार कर गयी है.इस उपलब्धि में मात्र चार साल ही लगे हैं...

अगले भाग की प्रतीक्षा करें...
कई बार देखा




डॉ.सुनीता ०९/०६/२०१२

एक बार नहीं कई बार देखा है
जीवन के पतझड़ में आंसुओं
की
झिलमिल अदभुत रेखा है

चलते-चलाते चौखट तक आती आवाजें
चाक पर रखे मिटटी के धोने सा घुमती
पृथ्वी के धुरी पर चक्कर काटती कुछ याद दिलाती हैं

हम उलझे रहे कर्मपथ के अमराई में
तरुण चांदनी पुकारे जीवन के अंगनाई में
सूरज के किरणे छेड़े मदमाती गीत सुनाएँ समझाती हैं

दौड़ती-धुपती धूल से यह कंचन काया
मोह के बंधन अनमोल अलख जगाते
चिंतन के पट खोले,बोले ऐसे जीवन के गांठे खोले हैं

मानसिकता के ओट से विश्वास के घूँघट पट उघारे
चलते आये भ्रम के बादल को छेड़े बोले
अग्नि के फेरों में जीवन को कैसे-कैसे लपेटे है

बार-बार जल के भी जलन न गई
जंगल के जूनून में जल-जल को मारे-मारे
भटकते-भटकते भाव चिन्ह को युगों-युगों के लिए छोड़ा है
  

स्मृति के पिछले पहर में            
डॉ.सुनीता 
०४/०६/२०१२ नई दिल्ली  

स्मृति के पिछले पहर में 
शहर के शोर से दूर किसी गांव में
नीम-पीपल,जामुन और बरगद के छाँव में 
गलबहियां करते पुरखे-पुरनिए 
बाट जोहती माँ के आँखों में चिंता के बादल घुमड़ते रहे 
अंगड़ाई लेती संध्या सुन्दरी हौले से बोली 
अपने चिलमन के पट खोली,खेली होरी बरजोरी 
धुंध,आंधी और बवंडर उसकी संगी,सखी सहेली-हेली 
अलबेली मतवाली मुस्कानों से मधुर रस टपके 
माधव,मुरकी पकड़े लोरकी गाये,गऊन के पदचाप सुनाये 
भोर-दुपहरी वन-वन डोले वन के बात बनाये 
बहुरिया बछरा देख मन हुलसाए 
अटखेली में गुम सूरज संग सुघड़ सहेली 
खेतों के मेढों पर बैठकर पिता साथ 
हेली-मेली की बातें सुनते बीते दिन और रातें
जीवन के उलझते धागों को सुलझाने की तरकीबें सीखते 
जाने कितने दिन,वर्ष,ऋतुयें गुजर गए 
उस तरह जैसे सीजन में लगते फल 
बदलते दिन के साथ चोला वहन करते 
अरमानों के दिन आँखों में लहलहाते फसलों की तरह 
तिलक लगाएं अब टहल रहे हैं 
आज पिता की उनीदी आँखें कुछ कहतीं हैं 
उनके दर्द खामोश लहरों के तरंग सरीखे बन बैठे  
पिछले पहरे के किसी कोने में अब भी भटक रहे हैं 
यादों के पिटारी में बंद संघर्ष के दिन आज मचलते हुए 
आगे बढ़ आयें हैं घिरे घनघोर बादल से...!

     सृजन की अंगुलियां


सृजन की अंगुलियां सृष्टि का आधार 
सम्पूर्णता का ख्वाब,ख्याल के परवाज़  
तेरे आने की आहट से दिल आबाद
एक किलकारी बिन दुनिया-जहाँ बेजार
जब दस्तक देगा उस दम मौसमे-ए-बहार  
घर-आँगन की मिटटी भी होगी गुलज़ार  
चिड़ियों-चुनमुन की चहक बच्चे के साथ होगी 
मांजी के दर्पण आँखों में उजाले लेकर आज़ाद हैं 
हौले से तन्हाई के अनंत बादल छटने के कगार पर है
दो-धाराएँ एक दिशा में बहने को मजबूर  
ममता के मीठे आँचल में एक ऐसा सरूर है 
संरचना के सौंदर्य से सृष्टि समूल में सुकून है 

         

लोकप्रिय पोस्ट्स