कुँए में मेंढक


कुँए में मेंढक
(तेलुगु कहानी)
पुटला हेमलता
अनुवाद : डॉ. जी. वी. रत्नाकर 




  रेल ने जैसे ही स्टेशन छोड़ा,स्टेशन की भीड़ छंटने लगी. कुली भी अपना-अपना सामान उठाकर बाहर की ओर जाने लगे. चहल-पहल कम हो गई.

       श्रीनू अपनी फली की टोकरी लिए प्लेटफ़ॉर्म पर एक कोने में बैठा है. एक हाथ से सिक्के गिन, वह अपनी जेब में डाल रहा है. उसने टोकरी से एक कवर निकाला और सार्व सिक्के उसमें डाल दी. फिर उस कवर को संभालकर रख दिया. वह सोचने लगा – “अभी तक कोटि क्यों नहीं आया ? पंद्रह मिनट के बाद एक पेसेन्ज़र ट्रेन आने वाली है, तब अगर थोड़े रुपये का सौदा कर लूं तो घर में शायद गालियाँ कम खानी पड़े.” और एक बार पैसे के कवर को देखा, उसे संतोष हुआ. पूरा कवर जेब में रख वह तिरुपति एक्सप्रेस में चढ़ गया और “फली ले लो... ताजी ताजी फली ले लो...” – ऐसी आवाज लगाने लगा. एक चार साल का लड़का टोकरी को लालच भरी नज़र से देखने लगा. श्रीनू उस लड़के के मनोभाव को भांप गया और ज्यादा जोर से आवाज लगाने लगा...


“माँ, मुझे भी फली चाहिए...” कहते हुए लड़का रोने लगा. माँ कुछ देर तो मनाती रही, पर आखिर में हारकर उसने श्रीनू को एक रुपये की फली देने को कहा और दस रुपये दिए.

     श्रीनू ने फली का पैकेट बांधकर बच्चे को दिया और चिल्लर के लिए जेब में हाथ डाला तो पाया कि सिक्के गायब थे. शायद चोरी हो गए थे. श्रीनू की हालत खराब हो गई. काटो तो खून न निकले. आँखों से आंसू बहने लगे. वह अच्छी तरह जानता था कि रेलवे स्टेशन पर कई जेब-कतरे होते हैं. फिर उसे लगा कि गरीब की जेब भला, कोई क्यों काटेंगा ? पर आज उसे पहली बार यह अहसास हुआ कि गरीब की जेब भी काटी जाती है. रेल से कब उतरा उसे होश न रहा. आंसू पोंछते हुए वह तुर्रा के पेड़ के नीचे बैठ गया. नज़रों के सामने ओबुलम्मा का चेहरा दिखाई देने लगा.

     श्रीनू का जन्म कब और कहां हुआ ? पता नहीं. कोई रेलवे स्टेशन पर छोड़ गया था. ओबुलम्मा, जो वडा बेचती थी, उसने बच्चे को पाला-पोषा और नाम रखा ‘श्रीनिवास राव’. लेकिन सभी लोग उसे ‘श्रीनूगाडु’ कहकर बुलाते थे. जब कोई पूछता तो बड़े गर्व से वह अपना नाम ‘श्रीनिवास राव’ बताता. ओबुलम्मा का पच्चीस साल का बेटा बहुत पहले गाँव छोड़कर चला गया था. फिर भी ओबुलम्मा को आशा बंधी रहती थी कि वह एक दिन जरूर लौटकर आएगा. जब श्रीनू दस साल का हो गया तो ओबुलम्मा ने उसे रेल में फली बेचने का काम सौंपा.

     पहले तो उसे बहुत अच्छा लगने लगा. लेकिन बाद में सभी मुश्किलों का सामना उसे करना पडा. पहले-पहल तो श्रीनू से बड़े फली बेचने वाले उसे रेल के डिब्बे से जबरदस्ती उतार दिया करते थे. क्योंकि वह उम्र में सबसे छोटा था. और अगर वह सौदा किए बिना घर जाता तो ओबुलम्मा उसे पीटती थी.


      धीरे-धीरे श्रीनू को दुनियादारी की समझ आने लगी. जो औरों पर धाक जमाता है उसी की चलती है. श्रीनू की हालत कुँए में मेंढक जैसी हो गई. उसकी दुनिया मात्र स्टेशन तक सीमित होकर रह गई. हर रोज वह रेलवे स्टेशन पर कई तरह के लोगों को देखा करता. विदेशियों को वह तरह-तरह की वेशभूषा में निहारता रहता.

     “अभी पंद्रह मिनट में ही पेसेन्ज़र ट्रेन आने वाली है, अब तक कितनी कमाई हुई ?” कोटिगाडु ने पूछा. श्रीनू ने अनसुना कर कोटि से ही प्रश्न किया – “उसकी बहन का गाँव कैसा है ?”

     कोटि ने बड़े उत्साह से झुककर कहा – “ओहो... हैदराबाद ? क्या बताऊँ ? तुम ही अपनी आँखों से देखना... बड़ी-बड़ी सड़कें, रंग-बिरंगी रोशनियाँ, पूरा यात्रा पर गए हों ऐसा माहौल. अरे हाँ, तूने कभी रंगीन सोडा पीया है ?” कोटि ने होठों पर जीभ फेरते हुए पूछा.

     “नहीं.” श्रीनू ने जवाब दिया.
    
     “अरे श्रीनू, तू वरंगल तक पेसेन्ज़र ट्रेन में फली तो बेच सकता है ना ?” कोटि ने पूछा.
    
     “रहने दे ! ओबुलम्मा नहीं मानेंगी. वह राक्षसनी है.” श्री ने हताशा भरे स्वर में कहा और कोटिगाडु की ओर देखने लगा.

     वह बडबडाने लगा – “मुझे बचपन से ही शहर पसंद है. जब से पैदा हुआ हूँ, इस गाँव को छोड़, कोई दूसरा गाँव ही नहीं देखा !”

     उसका चेहरा देखकर कोतिगाडु को हँसी आ गई. वह कहने लगा – “मैं तो पेसेन्ज़र ट्रेन में कई बार वरंगल जाता हूँ. एक घंटे का तो सफ़र है. इस दौरान हम आराम से फली बेच सकते हैं. बहुत ही मज़ा आता है.”

     धन... धन... की आवाज करती ट्रेन आ गई.

     “श्रीनू, देखो तुम औरतों के डिब्बे में चले जाओ ! मैं जनरल डिब्बे में जाता हूँ.” कोटि ने कहा.


     पूरा दिन श्रीनू बहुत ही उदास रहा. खाना भी ठीक से नहीं खाया. खाट पर लेटकर वह आसमान की ओर देखता रहा. सांझ से ही ओबुलम्मा श्रीनू के व्यवहार को देख रही थी.

     “श्रीनू, बेटा क्या बात है ?” उसने पूछा. श्रीनू एक मिनट रुका, फिर जवाब  - “मां, मैं भी कोटि के साथ वरंगल तक फली बेचने जाया करूंगा. हमें बहुत नफ़ा होगा.” बोलते समय उसकी आंखें उलझन के कारण विस्फारित हो गई.

     ओबुलम्मा को हंसी आ गई. श्रीनू के सिर पर हाथ रखते वह बोली – “बेटा, तुम छोटे हो, नादाँ हो – इसलिए मैंने तुम्हें आज तक कहीं दूर जाने नहीं दिया. वैसे भी मैं एक बेटा खो चुकी हूँ. अब तुमको खोना नहीं चाहती. मैं कठोर भले ही लगूं, लेकिन मेरे हृदय में भी दया और ममता है. कोटि के साथ तुम्हें जरूर जाने दूँगी. ठीक लगे तो रोज जाना वरना नहीं.”

     अविश्वास की दृष्टि से श्रीनू ने माँ को देखा. खुशी के मारे वह सो न पाया. रातभर वह सपने देखता रहा कि वह वरंगल तक फली बेचकर आता है... और ढेर सारे रुपये ओबुलम्मा के हाथ में रख देता है...

     “बेटा... संभालकर कोटि के साथ जाना.” पानी भरने जाती ओबुलम्मा ने कहा.

     कोतिगाडु के साथ श्रीनू उत्साह से चल पड़ा. जिस ट्रेन में वे जा रहे थे उसने आलेर स्टेशन छोड़ा. कोटि दूसरे डिब्बे में था. श्रीनू तो फूला न समा रहा था. दरवाजे पर खड़ा-खड़ा बाहर के पेड़, बिजली के खम्भे देख रहा था. वहां पर दो शराबी आपस में गाली-गलौच कर रहे थे.

     श्रीनू यथार्थ भूमि को छोड़ कल्पना-लोक में विचरण करने लगा. उसके पीछे जो शराबी थे वे मारपीट पर उतर आए. एक के पाँव की मार श्रीनू की पीठ पर लगी. उसने उठने की कोशिश की. तभी एक शराबी उस पर आ पड़ा. श्रीनू डिब्बे से बाहर उछलकर गिर गया. उसका सिर धडाम से एक पत्थर के साथ टकराया. सिर से खून बहने लगा. उसने बलपूर्वक आंखें खोली. तेज रफ़्तार से जाती ट्रेन, अपनी ओर घूरते यात्रियों की आंखें और खुले आकाश के अलावा दूसरा कुछ न दिखाई दिया. उसकी पलकें हमेशा के लिए बंद हो गई.

     ओबुलम्मा कुँए से पानी निकाल रही थी. देखा तो पानी में मेंढक था. उसने मेंढक को बाल्टी में ही रहने दिया. तभी कोतिगाडु, श्रीनू के मरने की खबर लेकर आया. कोटि के मुख की उदासी देख ओबुलम्मा उसकी ओर भागी. बाल्टी का मेंढक आश्चर्य से चारों ओर देख रहा था. वह मेंढक, जो कुँए में ही पैदा हुआ था, बड़ा हुआ था और कुआं ही जिसकी दुनिया थी. पर आज उसे चारों ओर का दृश्य विचित्र लगाने लगा. उसके लिए यह दुनिया नयी थी. वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि बाहर की दुनिया इतनी बड़ी हो सकती है. सृष्टि के रमणीय वातावरण को देखने वह अचानक ही उछला, पर गलती से वापस कुँए में ही जा गिरा. उसने देखा, नीचे गोल-गोल घुमता पानी था... ऊपर प्लैट जैसा आसमान.        


 नोट-कहानी और चित्र गुजरात से फारुख शाह जी ने भेजे हैं...
*
        

मिट्टी का कौर


 मिट्टी का कौर
( तेलुगु कहानी )

जाजुला गौरी
अनुवाद : आर. शान्ता सुंदरी


(यह एक तेलुगु कहानी का हिंदी तर्जुमा है.इसे मेरे पास गुजरात के फारुख शाह जी ने भेजा है.आप सब भी पढ़ें और देखें कैसे बचपन में भोजन की तलब क्या से क्या करवाती है....)


       बचपन से देखती आ रही हूँ । घर में माँ–बाप हमेशा लड़ते झगड़ते ही रहते हैं । वे क्यों लड़ते हैं, क्यों एक दूसरे को गालियाँ देते हैं और फिर आपस में ऐसे बातें करते बैठते हैं जैसे कुछ भी नहीं हुआ, मेरी समझ में तो नहीं आता था ।

       घर में राशन है ? खाने के लिए कुछ है ? बच्चे भूखे पेट सोते हैं या उन्हें खाने को कुछ मिलता है ? ये सब जानने की कोशिश भी करते हो कभी ? बस, अपनी मर्जी चलाते हो । रोज-रोज पीकर आना क्या इतना जरूरी है ? मजूरी करके पैसे कमाओ और सीधे आकर मेरे हाथ में दे दो, वरना यह घर चलाने का काम मुझसे नहीं होगा । रोज-रोज सबको फाके करने पड़ेंगे, हाँ ! – बुझे चूल्हे के सामने बैठकर माँ, बापू से कहती ।

       तेरी तो... क्या बकबक किये जाती है तू ? सारा पैसा लाकर तेरे हाथों में ही तो देता हूँ ! हड्डी-पसली एक हो जाती है, तो एक बूँद क्या पी ली, तू इतना शोर मचाती है ? सारा दिन कमरतोड़ मेहनत करके घर आता हूँ तो खिलाने-पिलाने की धुन नहीं रहती, तुझे ? जब देखो घर, बच्चे, गिरस्ती... बस ! मेरी कोई फिकर नहीं तुझे ? धत्त तेरी की... चिल्लाता हुए बापू गुस्से में बाहर चला जाता ।

       शाम को गया आदमी आधी रात को झूमता, लड़खड़ाता घर वापस आता । पूरे नशे में होता फिर भी माँ को पुकारता, अरी लक्ष्मी ! क्या कर रही है ? जोरों से भूख लगी है, खाना दे... ऐ ! सुनाई देता है कि नहीं... खाना दे... ! और आँख तरेरकर माँ को देखने लगता ।

         अरे तुम रात-बिरात चले आते हो तो कौन तेरी राह देखता बैठा रहेगा इधर ? नशे में धुल लौटा है न ? कितनी बार कहूँ कि पीना छोड़ दो ! शर्म नहीं आती ? माँ बापू को कोसने लग जाती ।

       क्या री, बढ़-चढ़कर बात मत कर, समझी ? मेरी मर्जी... कमाता हूँ, पीता हूँ... तू कौन होती पूछने वाली ? तू अपने मायके से लाई क्या पैसा ? फिर मुँह खोला तो मार डालूँगा... कहते हुए बापू माँ को पीटने लगता ।

     आधी रात को यह शोर सुनकर हम बच्चे जाग जाते, पर डर के मारे चुपचाप लेटे रहते ।

     माँ गालियाँ देती थी और बापू माँ को पीटता था । रोना-धोना, चिल्लाना रातभर चलता रहता था । यह सुन देखकर हमें भी रोना आ जाता, पर मैं और छोटी बहन एक दूसरे की ओर देखते हुए रोते-रोते न जाने कब सो जाती थीं !
       जरा बड़ी हुई तो हमारी तकलीफें थोड़ी-थोड़ी समझ आने लगी । बापू अकेला कमाता है उसमें से थोड़े पैसे शराब में उड़ा देता है । माँ बहुत समझाती कि बच्चे बड़े हो रहे हैं उनकी जरूरतें बढ़ रही हैं, उनके बारे में तो सोचो । एक-दो दिन बापू पीना छोड़ देता पर फिर से शराब की लत उसे नहीं छोड़ती ।

       एक दिन सुबह माँ ने कुछ भी नहीं पकाया । मेरे पेट में चूहे दौड़ रहे थे । धीरे से माँ के पास जाकर बोली, माँ भूख लगी है । कुछ खाने को बना दे न ?

       माँ ने कहा जरा ठहर जा बेटी ! भैया को दूकान भेजा है, चावल खरीदकर लाते ही खाना बना दूँगी ।

            आज सुबह से मेरा जी कुछ ठीक नहीं था । चक्कर आने लगा । भैया की राह देखते-देखते मैं थक गई । वह अभी तक नहीं आया तो मैं फिर माँ के पास गई और मचलकर बोली, पैसा ही दे दो माँ, कुछ खरीदकर खा लूंगी । भूख मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही है ।

       हाय मेरी बच्ची ! बस जरा सी देर और बर्दाश्त कर ले । सुबह खाओ तो रात के लिए कुछ नहीं बचता और रात को खाने पर सुबह सब खाली हो जाता है । मैं क्या करूँ बोलो, बेटी ? जो पैसे थे सब तेरे भैया को दे दिए । तेरा बापू भी खाली पेट काम पर चला गया, सुबह-सुबह । इस जलती धूप में न जाने कैसे काम करता होगा ? एक हफ्ते से काम भी नहीं मिल रहा है, इसी से और परेशानी बढ़ गई है। बापू के पास जितने पैसे थे, सब मुझे देकर गया है । बस कुछ देर और... वह देख तेरा भाई आ रहा है, इतना कहकर माँ चूल्हे के पास गई । मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी... पेट में जलन सी होने लगी। मटके से पानी लेकर पिया और दरवाजे के पास चली गई । सूरज सर पर आ चुका था । धूप तेज थी । तेज धूप में खड़े रहने से मुझे चक्कर आते हैं । तो वहाँ से चलकर सामने के पेड़ के नीचे चली गई ।

       पेड़ के नीचे, साए में जरा सी ठंडक महसूस हुई, लेकिन पेट के अंदर भूख की आग भभक रही थी । पेड़ के नीचे बैठकर मिट्टी में उँगली से आड़ी-तिरछी लकीरें खींचती रही । पर भूख की आग पल-पल बढ़ने लगी । मैंने इधर-उधर नज़र डाली कि कहीं कोई मुझे देख तो नहीं रहा है ? फिर जब तसल्ली हुई तो मिट्टी हाथ में लेकर उसे छाना । कंकड़ और पत्थर के टुकड़े अलग हो गए और महीन मिट्टी हाथों में रह गई । उसे सूँघकर देखा । मिट्टी की बू बड़ी अच्छी लगी । बस एक ही झटके में उसे मुँह में डाल लिया । जब तक भूख जरा कम न होती मैं मिट्टी छानकर खाती रही । कुछ देर बाद भूख कुछ कुछ मिटी । मैं चुपचाप चलकर घर के अंदर गई । घर पहुँचकर देखा तो चावल लगभग पक चुका था । माँ, भाई और बहन चूल्हे के पास बैठकर इन्तजार कर रहे थे । पर मैं मटके के पास जाकर लोटे भर पानी को गटगट पी गई और माँ के पास जाकर जमीन पर लेट गई । खाने के लिए अब तक इतना शोर मचाने वाली मैं चुपचाप जाकर लेट गई, यह देखकर माँ, भाई और बहन हैरान रह गए । मुझे यह भी पता नहीं था कि बाद में क्या हुआ... मैं गहरी नींद में डूब गई । शायद वे तीनों इन्तजार करते ही रह गए कि अभी उठेगी और खाना माँगेगी ।

*

हवाओं में घूले ज़हर

'लोकजंग' अखबार में प्रकाशित श्रृंखलाबद्ध लेख क्रमशः......!




परिधि से मेल


डॉ.सुनीता 
असिसटेंट प्रोफ़ेसर,नई दिल्ली 
18/12/2012 

रोटी !
पेट के परिधि से मेल नहीं खाता
उदर भूख प्रेम से परे
प्रेणना के गीत
गरीबी के कढ़ाई में खौलते तेल
सरकता,पसीजता रिश्ता
रहम से जीवन बसर करता एक परिंदा 
सागर के लहरों में ज्वालामुखी
जंगल के भीड़ में शरीर
सोहराते बरगद बगुले के शोर
यातना के गर्भ गृह में गाय सी स्त्री
गोल चाँद की परिकल्पना करती
कहन से अलग
तपते सूरज सरीखे बेलती रोटी सी कल्पना
कहाँ खो गयी
वह एक प्रियतमा
जो कभी भूख-भूख से व्याकुल
विरह में भी मुस्कान के गुलाब बेचती
बगुला भगत के भाग्य से बैर ठाने
बैरी सब्जी समय से मेल नहीं खाता
खता यह कि खत्म होते बटुए के भात
भविष्य पर सवाल खड़ा करते
कब्र खोदते
एक कफ़न को तरसते
उस मासूम से पेट की खता क्या ???
कौन बताये भला
उसके परिधि के आस्मां का अंत...!

एक खीझ


डॉ.सुनीता
असिसटेंट प्रोफ़ेसर नई दिल्ली
01/12/2012

मीठी धूप के एहसास में
खोये हुए अनसुने मार्ग पर चले
कांरवा साथ न था
लेकिन
उम्मीद के कई दीपक जल रहे थे
ठोकर मारते जमात को देखते हुए
दर्पण के धूल से उलझ पड़े
शिकवे की कई झाड़ियाँ लगीं
लेकिन
अनूठे जबाबों से चित्त पड़े
चतुराई ने हलके से एक गली पकड़ी
चौराहे से आँख बचाकर भाग खड़े हुए
कहीं कोई एक टुकड़ा गर्मधूप के मांग न लें
लेकिन
उसके इस भगौड़ेपन से वाकिफ
पकड़ लिया जकड़ के बाजुओं के जबड़े में
स्त्री के गाँठ बांधे आंचल के एक कोने में
जब तक जिआ उसे स्नेह के सम्मोहन के मोहपास में
गठिया लिया उस दम तक के लिए
लेकिन
उस एक दरार ने दरख्त के ऊँचाइयों से
झांकते सूरज को सूखे टहनियों में कैद कर लिया
यह कहते हुए
यह अबला के प्यार का बंधन नहीं है
बल्कि वृक्ष के जड़ों में जमे जमीं कि
सख्त पकड़ है
लेकिन
वह अनंत आसमानों में आँख मिचौली
खेलता रहा जीवन के एक हर पड़ाव से
कुछ उलहने देते हुए खीझ उठता है
मेरी फ़िक्र है किसी को
जैसे स्त्री ने चीत्कार किया हो पहली बार
एक पल को
पर्वत,पवन और पानी भी थरथरा उठे


जीवटता को सलाम


22 अप्रैल 2003 को सोनाली मात्र १७ साल की एक सुंदर युवती थीं.एक रात कुछ मनचलों ने उनके उपर तेजाब फेक दिया.जिससे चेहरे के साथ आँख भी जल गये.वह जीवन से हार गयीं.इच्छा मृत्यु की मांग करने लगीं.लेकिन एक दिन ऐसा आया जब वह अपने जीवटता से सारे देश में एक मिसाल बन बैठीं.उनके जले चेहरे बेहद भयावह लगते हैं.पुराने-परचित लम्बें अंतराल के बाद देखें तो उनके लिए पहचानना मुश्किल हो जाता है.उनके इस युद्ध को सलाम करते हुए.उन्हें ही समर्पित..!






डॉ.सुनीता


सहायक प्रोफ़ेसर,नई दिल्ली  
19/11/2012  


4:48



तेजाब के तेज को हर लिया 
हौसलों के ऊँची उड़ान ने 
दम तोड़ दिया व्यवस्था ने 
व्याकुल लोग देखते रहे 
वह निकल पड़ी दुनिया के आकाश में 
आँखों में मोती लिए दर्द के 
हृदय में कसक लिए जन्म के मर्म की
मुस्कुराती संध्या को सुंगंध दे गयी
एक अमर किला की महरानी
झूठे,पापियों और पाखंडियों को लताड़ के
लहू के टुकड़ों को रौंदें हुए आंचल में सम्भाले
अनंत यात्रा के उम्मीद में रात-दिन जली
जख्म को फूल की माल मानकर
मस्तक पर पड़े सिलवटों को झाड़कर
झांकते झुरियों को यातना के गृह में उतारकर
अभिशाप देती,दिला दी एक नये युग को सीख
पल-पल सोखते रक्त को हरा दिया
हौसले से मिशाल का एक इतिहास रच दिया
युगों-युगों से छाये अनहोनी आडम्बरों के बादल
आज बरस पड़े बिन बदली के मूसलाधार
धरा दरक उठी असीम पीड़ा के चीख से...

देह के अनंत आकाश


डॉ.सुनीता
सहायक प्रोफ़ेसर,नयी दिल्ली
15/11/2012

स्त्री देह के अनंत आकाश में
हलचल मचाते तड़पते सपने
भ्रमर करते मानव रूपी भौरे
उलझे-उलझे से उलझन बन उलझाते
भ्रम के बादलों को चीरता एक तन्हा चाँद
घुप्प अन्धेरें में घूमते अस्तित्व तलाश में तारें
भ्रमण को निकले इन तितलियों पर
मंडराते.इतराते.इठलाते इकलौते सवाल
सृजन के सांध्य बेला में गुनते हुए
गगन पर छाये पुष्प पुंज में ढले ये ठलुवे
गुथमगुथ्था किये देह के दर्दिले रेसों में
हौले से पीड़ा के अध्याय लिखते लहू
छलना-ललना के रूप रंग दिखाते
दस्तक देते नन्हे समय भूगोल
प्रत्यक्ष प्रतिकार के शब्द से अनजान
धरा के गोलाई धारण किये शरीर
एक नये आकार-प्रकार लेते जीव से
मचलते रूह में पले ख़्वाब पल-पल देखे
हासिये पर पड़े रोयें रोते-रोते एक रुख लेते
वक्त से पहले रुखसत होते हुए आगे-आगे
चल पड़े उपेक्षा के कटीले व्यंग भरे बाण समेटे
अंधी भूख की अनचाहे उत्कट लालसा
लघु रूप संवारें लक्ष्य भेदते छुवन के आकर्षण
नैनों के कठोर,कुरूप पिपासा को लक्षित कर
निगाह गड़ाए गेहुआं स्वरूप को कनखी से निहारते
टटोलते रक्त मज्जा के बिछुरे रिश्ते
दरकती आहें अरमानों के जठराग्नि में जले
जब-जब देखें देह के अंतर में बाहर भेडिये दिखे
(अधूरी)



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